Sunday, July 29, 2012
'नदी के पार नदी' मेरे पहले काव्य-संग्रह से
नदी को मैंने
एक कविता सुनाई
उस दिन
कविता में नदी थी
या नदी में कविता
जाने क्या था...
नदी की आँखों से
एक और नदी
बहने लगी
एक कविता सुनाई
उस दिन
कविता में नदी थी
या नदी में कविता
जाने क्या था...
नदी की आँखों से
एक और नदी
बहने लगी
Friday, November 25, 2011
कविता : स्त्री-द्वैत
बहुत झीना पर्दा है
दुःख और सुख में
रोती हुई स्त्री जब
अपनी तमाम बेड़ियों में जकड़ी रहकर भी
यक ब यक हँसने लगती है
और शोषक इतिहास के धुंआते किले
बदले समय की खुली बयार में
अपनी बेचारगी पर
अपना सिर धुनते नज़र आते हैं
मगर तभी
हँसती हुई स्त्री
अचानक रोने लगती है ज़ार-ज़ार
और रुग्न चारदीवारियों के भीतर से
आता बेखौफ अट्टहास
स्त्री रूदन को कहीं भीतर तक
दबा देता है
अपराजेय भाव से मदमत्त होकर
दुःख और सुख की यह आँखमिचौली
एक स्त्री के भीतर कहीं दूर तक
अपना सुरंग रचती चली आ रही है
जाने कितनी पीढ़ियों से
बहुत कम अंतर है
प्रकाश और अंधकार में
जूड़े कसती हुई स्त्री
अपनी छाती को उन्नत किए सगर्व
सूरज को चुनौती दे सकती है
तो वहीं फैलाकर अपनी केश-राशि
अंधकार के विभिन्न गह्वरों और रहस्यों से
अपने तईं एक मांसल तिलिस्म भी रच सकती है
एक बारीक रेखा भर का अंतर है
आशा और निराशा में
स्त्री नदी बन जब
अपने पीछे तरलता छोड़ती चलती है
या फिर वक्त और परिस्थिति के हाथों
सूखकर रेत और मिट्टी का सपाट मैदान ठहर
निर्मम और निरंकुश हाथों की कठपुतली
बन जाती है
सुई की नोक भर भेद है
धैर्य और क्रोध में
ज्ञान की प्रतिमूर्ति सरस्वती
अपने हाथों में पुस्तक की जगह
कब खड्ग उठा ले
और एक देवी का वाहन हंस
कब दूसरी के वाहन सिंह मे
तब्दील हो जाए
कुछ कहा नहीं जा सकता
बहुत मामूली भेद है
निर्माण और विनाश में
अपनी कोख और अपने रक्त से
दुनिया का नवनिर्माण करने वाली स्त्री
अपनी उदासीनता और रूदन से
एक तपता,निर्जन रेगिस्तान खड़ा कर
सबकुछ तपता हुआ और अभिशापग्रस्त
भी छोड़ सकती है
कितनी बारीक रेखा है
वात्सल्य और विद्रोह के बीच
अपनी आँचल तले अबोध शिशु को
एक पूर्ण, सक्षम पुरुष बनाने वाली
कोई स्त्री जब
अपनी करने पर उतर जाए
तो अपने आँचल को परचम बना
और लहराकर उसे
किसी आतततायी दुर्योधन-टोली को
नष्ट करने का बीड़ा भी उठा सकती है
और प्रतिशोध की ज्वाला में धधकती हुई
अपने दुश्मन के रक्त से
अपना केश- स्नान भी कर सकती है
बहुत-बहुत रूप हैं
गोचर-अगोचर
नैतिक-अनैतिक
अच्छे-बुरे
हर तरह के
इस जगत के और
अधिकाधिक भाव हैं हम सब के
इस जगत में
स्वयं से स्वयं के लिए
तो कभी एक-दूजे के लिए
मनुष्यों का जीना और सोचना
जाने कैसे-कैसे सम-विषम धरातलों पर
कितने झंझावातों और अंतर्द्वंदों में
अनवरत रूप से प्रवहमान रहता है
और जाने यह कैसी समेकित करने वाली
शक्ति है एक स्त्री की
कि वह अपने तईं
परस्पर विरोधी दिखते इन भावों के द्वैत
को समाहित किए चलती है
सरलता और अपनी सहजता में
कविता : हँसी और हिमनद
एक लड़की हँसती है
जी भर हँसती है
शुरू में मंद-मंद
और बाद में पूरे जोर से
मगर यह क्या
उसकी हँसी एकदम से यूँ ध्वनिरहित….
हँसते-हँसते वह लोटपोट हो जाएगी
मगर क्या मजाल
कोई सुन ले उसकी हँसी
वह तो बस गर्दन झुकाए
अपने अंदर फूटते सूर्योदय की
ऊर्जा से ही चालित है और
हँसते हुए उसका बदन
पेड़ की किसी लचकती डाली सा कंपायमान है
सुबह की क्रमश: तेज होती रोशनी को
आत्मसात करता उसका चेहरा
केसर में नहा-नहा जाता है
वह हँस रही है, हँसे चले जा रही है
वह जितनी बार अपने होठों के
युगल-पट बंद करना चाहती है
अंदर से गुपचुप हँसी का कोई नया झोंका
उसे बार-बार खोल देता है
वह परेशान हो-होकर खुद को ही कोसती है .....
‘मुई मेरी यह हँसी किसी दिन
मेरी जान निकाल कर ही रहेगी
देखो तो कितनी बेलज्ज और ढीठ है
यह ख्याल तक नहीं करती कि
आस-पास बैठे लोग क्या सोचेंगे
बस कहीं भी किसी बात पर शुरू हो जाती है’
लड़की को याद आने लगते हैं तब.........
कैशोर्य के अपने वे निर्भीक और उन्मुक्त दिन
जब वह सुबह-सुबह हुगली के तट पर
सैर को निकल जाती थी......
तब माँ के लाख ताकिद करने के बावजूद
ओढ़नी अपने स्थान पर कहाँ टिक पाती थी
वह मेरी किसी दुष्ट और दु:साहसी सहेली की तरह
मेरे गले से लिपटी अपने ही नशे में रहती
मैं आगे की ओर चली जा रही हूँ
और वह पीछे की ओर अपनी दोनों बांहें पसारे
जाने किससे क्या बतिया रही है
और जाने किसको क्यों मुँह चिढ़ा रही है
हवा में फड़फड़ाती ओढ़नी
मुझे भी किसी पक्षी सा डैने रखने का आभास कराती
मगर तभी मुझे अपने अगल-बगल के लोगों का ध्यान आता
और मैं उसकी दोनों चोटियों को अपनी मुट्ठी में ले
पहले तो उनका गठबंधन कराती और फिर
उन्हें अपने गर्दन से बांध लेती
मानों अभी-अभी हवा को पूरे रफ्तार से
अपने फेफड़े में भरते
और भरपूर उड़ान के संकल्प से भरे पक्षी ने
अचानक से अपने डैंनों को समेट लिया हो...
मैं घर पहुँचती, उसके पहले
सुबह की मेरी इस उड़ान भरी सैर के
नमक-मिर्ची लगे किस्से
मेरे आंगन में मेरी माँ और बहनों के साथ
मेरा इंतजार कर रहे होते
मैं अपनी माँ के नकली गुस्से का जवाब
उसकी ठोढ़ी पकड़ कर देती....
‘माँ तुम समझती क्यों नहीं
तुम्हारी बेटी मैं हूँ, यह ओढ़नी नहीं
मैं तो तुम्हारी हिदायतों का ध्यान रखती हूँ
मगर इसे कौन समझाए ....’
और फिर मैं,मेरी माँ और
मेरी बहनें ठठाकर हँस पड़तीं
वह लड़की यहाँ दिल्ली में
मेरी बात पर यूँ चुपचाप हँसते हुए
जाने कब और कैसे हुगली और हावड़ा से होकर आ जाती है
और कैसे-कैसे रंगों में डूबती-उतराती चलती है
मैं ठिठक कर उसकी इस आवाजाही को
किसी मूकदर्शक सा देखता भर चला जाता हूँ
और वह किसी मंजे एथलीट सा
झट आज-कल और कल-आज के बीच
कूदती-फाँदती चलती है
तभी तो………
आज भी वह वैसी ही निर्दोषता और शरारत से
खुद को मजबूर बताती है
जैसे हुगली के तट पर अपने सैर के
उन दिनों में बतलाया करती थी
बस जगह बदली है
मगर इस शोख लड़की के बहाने बनाने के अंदाज़ नहीं बदले
घर की जगह ऑफिस ने ले ली
माँ की जगह मैडम ने
और दुपट्टे की जगह एक लड़के नें
‘मैडम मैं क्या करूं यह बात ही ऐसी करता है’.....'
इस तरह भावविभोर होकर हँसती लड़की को
सिर्फ देखा भर जा सकता है
और इस देखने में पूरा जीवन बिताया जा सकता है
कल्प को पलों में बदलता हुआ महसुस किया जा सकता है
पल-पल बनती-बदलती इन आत्म-लीन लहरों को
मन भर पीया जा सकता है
उसके साथ रहकर
सुदूर दिल्ली में हुगली के नमक का स्वाद
चखा जा सकता है
उसमें खोया जा सकता है
अपना वजूद भुलाकर, अपनी ख़ुदाई मिटाकर
हमेशा-हमेशा के लिए
कयामत की घड़ी तक
उसी लड़की की अघोष हँसी को
सुन नहीं देख रहा हूँ मैं
जिसका निमित्त मेरे ही ढीठ शब्द हैं
मैं खुश होता हूँ
अमला-पगला-दीवाना सी मेरी बातों से
जोड़ी भर रक्तिम अधरों पर
नि:शब्द मगर उजली हँसी की
रजत-आभा फैल जाती है
मानों कोई सद्यःविकसित लाल गुलाब
वर्षा की रिमझिम में तरोताजा हो उठा हो
और तब एक गौरवर्णा
गंगोत्री बन जाती है सहज ही
देखते-देखते मेरी आँखों के सामने
और फूट पड़ती है उससे एक प्रवहमान धारा
खुशियां बिखेरती अपने दोनों ओर
आगे बढ़ती, हर बाधा को पार करती
निवारण करती दु:खों का
प्रक्षालन करती हर तरह के मैल का
हरती कैसी भी थकान
नूतनता से भरती तन-मन को
और मैं बहे चला जा रहा हूँ
उसके पथ में,
उसकी गति बनकर
उलटता-पुलटता उसके साथ ज्यों कोई हिमनद
अपनी रेखाओं और कंपन में
यह हँसी विशिष्ट है
अम्लान है
और संभव है
हिमनद और गंगोत्री के बीच कोई
मूक संधि भी हो
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