Sunday, November 6, 2011

कविता : अंधेरा

      
प्रकृति की विरासत से तुम्हें
दिन और रात मिले थे
मगर तुम्हारी ज़रूरत
तुम्हारे प्राप्य से बाहर जा रही थी
तुममें बेसिर पैर की आकांक्षाएं
आकार लेने लगीं
बढ़ने और फैलने लगीं
अपनी बेतरतीबी में।

प्रकृति की अन्यथा कल्याणकारी
नाप-जोख
तुम्हें असंतुष्ट रखने लगी
और तुमने  पहले आग और
बाद में बिजली की खोज की

भोग और विलास का पहाड़
ऊँचा और ऊँचा उठता चला गया

ताकतवर लोगों का 'कार्टल' बना
बिजली, तेल, कोयला,लोहा आदि
शक्ति के सभी संसाधनों के
उत्पादक,उत्खननकर्ता,नियंत्रक,
वितरक और उपभोक्ता सभी वही बने
रोशनी के चंद क़तरे
कभी किसी और को मिल जाएं ,
उनकी मर्जी ठहरी
नतीजा.....
बिजली है और नहीं भी
जहाँ है ज़रूरत से अधिक
जहाँ नहीं है, वहाँ आपात स्थितियों में भी नहीं
अनिवार्य आवश्यकताओं के लिए भी नहीं





प्रकृति की विरासत से तुम्हें
दिन और रात मिले थे
सबको बराबर मिला था
प्रकाश और अंधकार
दुनिया तब एक दिखती थी
मगर जब तुमनें ढूंढ़े
रोशनी के विकल्प
उसके क़तरों में बंट गई दुनिया
जिसके एक बड़े हिस्से में
चला आया अंधकार
जो कहीं अधिक अप्राकृतिक
अन्नायपूर्ण और भयावह है

प्रकृति की तुला पर
तुम सबका वज़न एक था
मगर उसकी डंडी जब
तुमने थामी
मालिक बना तो कोई नौकर
शोषक बना तो कोई शोषित
पूंजीपति बना तो कोई सर्वहारा
प्रकृति द्वारा हुए वितरण में
तुम्हें दिन और रात मिले थे
समान रूप से, समभाव में
मगर तुम्हें यह समानता पसंद नहीं आई
तुम्हें प्रकृति का यह द्विविभाजन भी पसंद नहीं था
तुम्हें किसी भी तरह की बराबरी
अब खलने लगी थी
अंधेरे में रहना तुम्हें
जंगलीपन और असभ्यता का प्रतीक लगने लगा
तुम प्रकाश के पथ पर एक बार जो आगे क्या बढ़े
बढ़ते ही चले गए
तुम अपने आप को निरंतर सभ्य बनाते चले गए
तुमने मनुष्यों की मंडिया लगाई
ग़ुलामों की खरीद-फरोख्त की
उन्हें पशुओं के पैरों में बांधकर
'दौड़ प्रतियोगिता' का मज़ा लिया
अपने विरोधी स्वरों को
कतारबद्ध कर
निस्संग भाव से

'कांसनट्रेशन कैंप' के हवाले किया
तो कभी उनके शहरों पर
एटम बम गिराकर
उन्हें पल-भर की रोशनी में ऐसा नहाया
कि आने वाली उनकी कई नस्लें
रोशनी के भय से
अपनी आँखें नहीं खोल सकीं


तुम्हें रोशनी पैदा करना आया
रोशनी में जीना भी
मगर तुम्हें अंधेरे कोनों को
रौशन करना नहीं आया
एक से बढकर एक हुनर सीखा तुमनें
मगर उजाला बाँटने का हुनर
तुम्हें नहीं आया
तुम सीखना भी नहीं चाहे





दिन और रात के अंतर को
तुमने पाट दिया
मगर बढ़ा दी
मनुष्य और मनुष्य के बीच की खाई
तुमने अपना 'ज्योति-रथ' दौड़ाया
प्रकृति के सीने पर
मगर तुम हार गए
अपने अंदर के अंधकार से 






Saturday, July 9, 2011

कुछ गजलें


एक

रक़ीब बन गया है वो, था जो तेरा राजदाँ कभी
किसने तुम्हें बख्शा है, मेरे दिल-ए-नादाँ कभी
रौशनी बुझ गई आखिर बूढ़ी उन आँखों की
बसती थी जिसमें पुरानी पनीली कोई दास्ताँ कभी
लहरों में जाने कब कहाँ मिटते चले गए
थे रेत पे हर सू बने उलप़फत के जो निशां कभी
किसी चाँद को तकता भी तो कैसे, मेरे हिस्से
नहीं था कहीं, मेरा अपना कोई आसमां कभी
बस्ती कब की है जलकर राख में मिल चुकी
कमबख़्त कब ये जाएगा, दिल में था जो बैठा धुआँ कभी
दो
रुदन और हँसी में बच्चा बदल रहा है
दुख और खुशी में बच्चा बदल रहा है
ग़ौर कीजिए उसकी छोटी-से-छोटी बात पर
अपनी हर बतकही में बच्चा बदल रहा है
गले लगिए और उसकी धड़कनों को सुनिए
साँसों की आवाजाही में बच्चा बदल रहा है
बढ़ रहा है वो दिन दूनी रात चैगुनी रफ्रतार से
इंच-इंच की लंबाई में बच्चा बदल रहा है
कोई दाग़ नहीं दिखता अपने चाँद में जिसे
माँ की बदगुमानी में बच्चा बदल रहा है
दीवारों पर उकेरे हैं उसने अक्षर कई
अपनी टेढ़ी-मेढ़ी लिपि में बच्चा बदल रहा है
पिता की छाती पर सिर रख बेखौपफ सो जाता है
दरख़्त छतनार की निगहबानी में बच्चा बदल रहा है
सबक सीखता है रोश नए-नए, पाठशाले में
दिनचर्या की रवानी में बच्चा बदल रहा है
तीन
जब भी देखा शहर अपना नीम अंधेरे में दिखा
दिन भर सोया किया, रात भर मैं भटका किया
सच पूछो तो इस हिसाब से गाफिल ही रहा
किसको मैंने क्या दिया, किससे मैंने क्या लिया
तनहाई की खुशबू है हर सू जफ़ा की महफ़िल में
ऐ खुदा! तूने मुझे क्या खूब हंसी ये मंज़र दिया
रास आने लगा है अपना बौना कद ही अब तो
हर बड़ी हस्ती ने मुझको है इतना छोटा किया
नशे में कौन इसका हिसाब रखता है शाकी कहो
कितने जाम खुद से पिए, कितने तेरे हाथों से पिया
लेन-देन इक-दूजे से कुछ इस तरह पूरा किए
उसने मुझे आँसू दिए, जब-जब मैंने उसे मुस्कान दिया
घर के पुराने आईने की अब किसे दरकार है
बाज़ार से मैंने भी है इक नया चेहरा लिया
है पुर सुकूँ बड़ा गुमनामी का अंधेरा, अज़ीज़ों!
जब मर्ज़ी है सोया किया, जब मर्ज़ी है जागा किया